बुधवार, 30 नवंबर 2016

ग़ज़ल,

दिल-ए-बर्बाद, को दिल-ए-आबाद कहिए,
सिनेमा में खड़े होके, ज़िंदाबाद कहिये।

कहने वाले तो, क्या कुछ नहीं कह जाते,
क्यों न  फिर आप, हाल-ए-बेदाद कहिये।

ये मुल्क थोड़ा आपका भी तो है शायद,
कह डालिये, जो इसको जायदाद कहिये।

रहते हैं तो रहिये हज़ार पहरों में ,
खुद को लेकिन, मगर आज़ाद कहिये।




वही लोग

वही लोग मारे जायेंगे ,
वही लोग देख कर ताली बजायेंगे ,
जो मारेगा उसी की पूजा करेंगे,
जो मरेंगे वही लोग पूजा करेंगे।
वो जो पहले मुर्गों को लड़ाते थे,
अब लोगों को लड़ाते हैं,
ये देख कर वही लोग फिर
नारे लगाते हैं।
जो मरे हुए लोग हैं वो ज़िन्दा लोगों
को देख कर हंसते हैं,
मरे हुओं को अपने मरने का यक़ीन नहीं हैं,
वो ज़िन्दा लोगों से अपने मरने का सबूत मांगते है।
जज सुनवाई नहीं करता है,
जो सुनवाई करता है वो जज नहीं है।
जिसकी लाठी उसकी भैंस है,
जिसकी भैंस है उसका कोई नहीं है ।
बहरों का शहर हैं,
गूंगों ने संभाला है,
जो बोल सकते हैं उनकी
ज़ुबानों पे ताला हैं ।

जन्नत का ख्वाब

जन्नत का ख्वाब
एक एैसा ख्वाब है
जिसको दिखाने से सब कुछ हो सकता है।
ये ख्वाब 
लोगों के लिए एक नशा है।
लोग जन्नत में इतना यकीन करते हैं,
कि आंखों के सामने दिख रहा सच
छलावा लगता है ।
लोगों को कह दिया जाता है कि
बस इतना सह लीजिए,
सब्र कीजिए,
उसके बाद सब आसान हो जायेगा।
लोग इस अफवाह पर यकीन कर लेते हैं।
जो यकीन नहीं करते
उनको जबरन मनवा दिया जाता है।
सवाल न तो दुनियावी जन्नत के बारे में
किया जा सकता है,
न तो आसमानी जन्नत के बारे में
किया जा सकता हैं,
सवालों से जन्नत के सौदागर खौ़फ खाते हैं ।

जन की बात

पहले जन की बात कीजिए,
फिर जन धन की बात कीजिए।
उसके बाद मन की बात कीजिए।
जब इस से काम ना चले,
तो काले धन की बात कीजिए ।
फिर देश की बात कीजिए,
उसे जनता तक पहुंचाने के
संदेश की बात कीजिए।
सफर की बात कीजिये
मुश्किलों की बात कीजिये,
चलने की बात कीजिये,
मुश्किल समय में आप के ढलने
की बात कीजिए ।
बार्डर की बात कीजिये,
आर्डर की बात कीजिये,
कुछ गीत की बात कीजिये,
संगीत की बात कीजिये,
आभासी शत्रुओं पर जीत
की बात कीजिए ।
बातों ही बातों में
सब बदल जायेगा,
वो ख्वाबों वाला सुनहरा
कल भी नज़र आयेगा ।
उम्मीद नज़र भले न आये
आंख गडा़ये रहिए,
चाहें जैसे भी हो
बात बनाये रहिए।

बुधवार, 10 अगस्त 2016

रेडी मेड

बदलाव वक़्त के साथ 
देखने में 
सुनने में 
और सबसे ज़्यादा समझने में 

कब होगा ?
मत पूछिए। 

पूछिए वो सवाल 
जिसका जवाब तैयार हो
बना बनाया , रेडी मेड।  

आजकल मेहनत नहीं करना चाहता कोई ,
सबको जल्दी है 
आगे जाने की 

और उसे से भी ज़्यादा पीछे छोड़ने की 
अपने आस पास के लोगों को 
दोस्तों को 
पियर  ग्रुप को 
पड़ोसियों को 

नहीं देख पाते वो कि 
क्या छूट रहा है पीछे 

वो खुद छूट रहे हैं 
उनका वजूद 

जिस कद को बढ़ाना चाहते हैं 
वो घट रहा है 
दूसरों की नज़र में 
खुद की नज़र में भी शायद 

लेकिन फिर भी 
इस चूहा दौड़ में शामिल होना है ,

लोग बदलाव के सवाल का सामना नहीं करना चाहते 
मत पूछिए ऐसे सवाल 
बन जाइये रेडी मेड 
मेड इन इंडिया। 

शनिवार, 23 जुलाई 2016

तुम चली आओ।

तुम होती तो रौशनी होती
तुम होती तो सितारे चमकते

आज तुम नहीं हो
तो दिल नहीं लगता,

बिस्तर, तकिया, कम्बल
सारे तुम बिन
सिकुड़े सिकुड़े से हैं ,

घर में एक हंसी की गूँज
की बेहद ज़रुरत है ,

तुम चली आओ।

तुम नहीं होती तो होंठ सूख जाते हैं
तुम नहीं होती तो आँखें भीग जाती हैं ,

तुम्हें पता है कि
मुझे अकेले खाना अच्छा नहीं लगता,

एक अकेली प्लेट
राह तकती है,

घर में तुम्हारी प्लेट इंतज़ार करती है

तुम चली आओ।

तुम नहीं होती तो मैं बाहर नहीं जाता
तुम नहीं होती तो ठंडी हवा नहीं आती

घर में बस एक खुश्क
सा मौसम बना रहता है,

इस मौसम को बदलने के लिए
मेरी जान

तुम चली आओ।